नवीनतम वृद्धि ( हिन्दी )

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2013-04-30
अपने बच्चे को पैगंबर की कहानी सुनायें: इस पुस्तिका में हमारे प्रिय पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बचपन से संबंधित कहानियों का एक समूह प्रस्तुत किया गया है, जिन्हें बच्चों को सुनाना उचित है।

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2013-04-25
इस ऑडियो में इस बात का उल्लेख किया गया है किस तरह मानव समाज में ईश्दूतों के अवतरण की शुरूआत हुई और विकास करते हुए एक महान संदेष्टा के ईश्दूतत्व पर संपन्न हो गयी - और वह समस्त ईश्दूतों व संदेष्टाओं के नायक मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। तथा ईश्दूतत्व के संक्षेप इतिहास का वर्णन करते हुए हमारे अंतिम संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ईश्दूतत्व, उनके अवतरण के समय धार्मिक व सामाजिक स्थितियों, उनके गुणों, पवित चरित्र, जीवन की घटनाओं, कठिन परिस्थियों, उनकी जाति के लोगों का आपके साथ दुर्व्यवहार और आपका उनके साथ सदव्यवहार का उल्लेख किया गया है। इसी तरह पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ईश्दूतत्व की सच्चाई, उसके प्रमाणों का चर्चा करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि आप पर ईश्दूतत्व का समापन हो जाता है। अतएव, आप अब परलोक तक सर्वमानवजाति के लिए अल्लाह के ईश्दूत व संदेष्टा हैं और सबके लिए आपका अनुपालन करना अनिवार्य है।

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2013-04-25
इसलाम के सिद्धान्त : इस ऑडियो में इस्लाम धर्म के नामकरण का कारण, इस्लाम शब्द का अर्थ, इस्लाम और कुफ्र की वास्तविकता, कुफ्र की हानियाँ और उसके दुष्ट परिणाम तथा इस्लाम में प्रवेश करने के लाभ का चर्चा करते हुए, यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य को अल्लाह के आज्ञापालन के लिए, अल्लाह के अस्तित्व, उसके गुणों और पसंदीदा तरीक़ों को जानने की ज़रूरत है। तथा उसके इस ज्ञान को विश्वास व यक़ीन के सर्वोच्च स्तर पर पहुँचा हुआ होना चाहिए। तथा मनुष्य को इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए स्वयं कोशिश नहीं करनी है, बल्कि अल्लाह ने अपने कुछ बंदों को इस मकान कार्य के लिए स्वयं चयन कर लिया है, और उन्हें यह ज्ञान प्रदान करके, उसे अपने सभी बंदों तक पहुँचाने का आदेश दिया है। अब बंदों को चाहिए के अल्लाह के चयनित सत्यवादी संदेष्टाओं को पहचानें, उन पर ईमान लायें, उनकी बातों को सुनों और उनकी शिक्षाओं और निर्देशों के अनुसार जीवन बितायें। इसके अलावा मनुष्य के लिए अल्लाह की अज्ञाकारिता का कोई अन्य रास्ता नहीं है।

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2013-04-25
इस ऑडयिों में उन बातों का उल्लेख किया गया है जिन पर हमारे संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें ईमान लाने का आदेश दिया है, और उनमें सर्व प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण अल्लाह पर ईमान लाना अर्थात ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ का इक़रार करना है। जिस पर इस्लाम की आधारशिला है, और जिसके द्वारा एक मुसलमान के बीच और एक काफिर, मुश्रिक और नास्तिक के बीच अंतर होता है। लेकिन केवल इस कलिमा का उच्चारण मात्र ही काफी नहीं है, बल्कि उसके अर्थ और भाव पर पूरा उतरना ज़रूरी है। इसी तरह ‘इलाह’ (पूज्य) का अर्थ और ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ की वास्तविकता का उल्लेख करते हुए, मानव जीवन में इस कलिमा के प्रभावों का उल्लेख किया गया है। अंत में उन अवशेष बातों का उल्लेख किया गया है जिन पर ईमान लाने का पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें आदेश दिया है, और वे : अल्लाह के फरिश्तों, उसकी पुस्तकों, उसके पैगंबरों, परलोक के दिन, और अच्छी व बुरी तक़्दीर (भाग्य) पर ईमान लाना, हैं।

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2013-03-31
अल्लाह सर्वशक्तिमान और उसकी महानता व महिमा से अनभिज्ञ कुछ अवा के यहाँ अल्लाह को गाली देना, बुरा भला कहना और उसे ऐसे शब्दों और गुणों से नामित करना मशहूर हो चुका है जिनका चर्चा करना या उन्हें सुनना एक मुसलमान के लिए बहुत दुलर्भ होता है। और कभी तो इसे ऐसे लोग कहते हैं जो अपने आपको मुसलमान समझते हैं, इसलिए कि वे शहादतैन यानी ला इलाहा इल्लल्लाह और मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह का इक़रार करते हैं। कभी तो कुछ नमाज़ियों से भी ऐसा हो जाता है, और शैतान उनकी ज़ुबानों पर इसे जारी कर देता है। और उनमें से कुछ को शैतान यह पट्टी पढ़ाया है कि वे उसके अर्थ को मुराद नहीं लते हैं, और न ही उससे अपने पैदा करनेवाले का अवमान करना चाहते हैं, तथा उन्हें यह समझाया है कि यह बेकार (तुच्छ) बातों में से है जिस पर ध्यान नहीं दिया जाता! इसी कारण उन्हों ने इसमें लापरवाही से काम लिया है! इस पत्रिका में इस मामले की गंभीरता को बयान किया गया है।

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2013-03-29
मैं जानती हूँ कि घर में कुत्ता रखना हराम (निषिद्ध) है, किंतु मेरे पास ग्यारह साल से एक कुत्ता है, फिर मैं ने इस्लाम स्वीकार कर लिया, मेरे पास कुत्ता मेरे इस्लाम स्वीकार करने के पूर्व से ही है, तो क्या मेरी नमाज़ क़बूल होगी ॽ जब कुत्ता मर जायेगा तो मैं दूसरा कुत्ता कभी भी नहीं लाऊँगी ; क्योंकि अब मुझे पता है कि यह हराम है।

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2013-03-29
क्या यह बात जाइज़ है कि ‘‘फेसबुक” पर मुसलमान आदमी का खाता ग़ैर मह्रम महिलाओं के नामों पर आधारित हो और यह मात्र अल्लाह सर्वशक्तिमान के धर्म की ओर आमंत्रण देने के उद्देश्य से है ? हमें इस बात से अवगत करायें, अल्लाह तआला आप को लाभ प्रदान करे और आप को बेहतरीन बदला दे।

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2013-03-29
मैं सोलह साल की एक लड़की हूँ, और एक ऐसे परिवार से हूँ जो धर्म के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं, मैं एक अकेली हूँ जो नमाज़ पढ़ती हूँ और इस्लाम की शिक्षाओं का पालन करने का प्रयास करती हूं, इसीलिए मुझे बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उन्हीं में से यह है कि मेरी माँ मुझे इशा और फज्र की नमाज़ पढ़ने से रोकती है और कहती है कि वे दोनों अनुचित समय में हैं !! इसके बावजूद मैं उन्हें चुपके से पढ़ लेती हूं, और यदि वह मुझसे आकर पूछती है तो मैं कहती हूँ कि: मैं ने नमाज़ नहीं पढ़ी . . . ! तो इस बारे में शरीअत का प्रावधान क्या है ॽ क्या मेरे लिए ऐसी स्थिति में झूठ बोलना जइज़ है ॽ तथा मैं पिज़्ज़ा रेस्तरां में काम करता थी और यह रेस्तरां सूअर बेचता था इसलिए मैं ने उसे छोड़ दिया, और जब उसने मुझसे पूछा तो मैं ने उससे कहा कि उन्हों ने मुझे निकाल दिया है, तो इस स्थिति में भी शरीअत का दृश्य क्या है ॽ एक दूसरा मुद्दा यह है कि मैं अपनी माँ के साथ ट्रेन से एक दूसरे शहर का सफर करने वाली हूँ और ज़ुहर और अस्र की नमाज़ का समय ट्रेन ही में हो जायेगा, और उस समय मेरे लिए उनकी अदायगी करना संभव न होगा, तो फिर क्या करना होगा ॽ मैं ने सुना है कि नमाज़ों को एकत्र करके पढ़ना जाइज़ है, लेकिन मुझे नहीं पता कि कैसे . . .! क्या इसका मतलब यह है कि मेरे लिए ज़ुहर और अस्र की नमाज़ ज़ुहर की नमाज़ के समय पढ़ना संभव है, और इसे कैसे पढ़ा जायेगा ॽ यह बात निश्चित है कि मैं इशा और फज्र की नमाज़ भी पढ़ने पर सक्षम नहीं हूँगी क्योंकि मेरी माँ मेरे साथ होगी, तो फिर क्या करूँ ॽ क्या दूसरे समय में नमाज़ों की क़जा की जायेगी, और कैसे ॽ इसके अलावा, मेरी माँ मुझे हिजाब पहनने से भी रोकती है, और इस बात पर ज़ोर देती है कि मैं ऐसा पोशाक पहनूँ जो उस समाज और वातावरण के अनुकूल हो जिसमें मैं रहती हूँ, उदाहरण के तौर पर गर्मियों में मुझे छोटे कपड़े पहनने पर मजबूर करती है, और कहती है कि सूरज त्वचा के लिए उपयोगी है . . इन सब के बावजूद, मैं इन दबावों का विरोध करती हूँ, और यथा संभव शालीनता अपनाने का प्रयास करती हूँ, . . लेकिन मैं वास्तव में उस समय उदास और दुखी होती हूँ जब मैं अपनी माँ को देखती हूँ कि वह मुझसे गुस्सा करती है, लेकिन मैं भी अपने धर्म के सिद्धांतों को त्याग नहीं कर सकती, तो क्या आप कोई नसीहत करेंगेॽ

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2013-03-29
अल्लाह का शुक्र है मैं हाल ही में मुसलमान हुई हूँ, मैं एक हिंदू समाज में पली बढ़ी हूँ और निरंतर उसी में रह रही हूँ। यह माहौल मेरे लिए अपने नये धर्म के पालन के रास्ते में बहुत सी बाधाएं पैदा करता है, और यहाँ पर निश्चित रूप से मेरा प्रश्न नमाज़ के बारे में है, मेरे माता पिता बहुत कट्टरपंथी हैं और वे दोनों मुसलमानों के बारे में कुछ भी सुनना नहीं चाहते हैं, बजाय इसके कि उन्हें यह पता चले कि उनकी बेटी ने इस्लाम स्वीकार कर लिया है! इसलिए मैं उनसे इस मामले को गुप्त रखी हूँ, और समस्या यहाँ पर निहित है कि मैं घर में नमाज़ नहीं पढ़ सकती हूँ, घर बहुत छोटा है और उसमें कोई भी कुछ करता है तो उसमें उपस्थित सभी लोगों को उसका पता चल जाता है, एक बार मेरी माँ ने मुझे नमाज़ पढ़ते हुए देख लिया तो उसी समय से वह मुझ पर नियंत्रण कणा किए हुए है और मुझ पर पाबंदियाँ लगाती रहती है, यह तो घर का मामला है, रही बात आफिस की तो उसमें स्थिति और भी कठोर है, क्योंकि वहाँ किसी भी तरह से नमाज़ पढ़ना संभव नहीं है। इन सभी प्रतिबंधों को देखते हुए मैं वुज़ू करती हूँ और अपने आपको नमाज़ के लिए तैयार रखती हूँ और उसका समय होते ही अपनी मेज़ पर बैठी हुई नमाज़ पढ़ती हूँ। चुनाँचे नमाज़ की सभी कैफियतों को अपने दिल में अंजाम देती हूँ, रही बात घर की तो मैं सामान्य रूप से नमाज़ के लिए उचित समय की ताक में रहती हूँ, यदि मुझे अवसर मिल जाता है तो पढ़ लेती हूं, अन्यथा मैं लेटे हुए या बैठे हुए या इसके अलावा अन्य तरीक़े पर नमाज़ पढ़ती हूँ। स्थिति बहुत कठिन है, कभी कभी मैं नियमित रूप से नमाज़ पढ़ना शुरू करती हूँ कि अपनी माँ के आने की आवाज़ सुनती हूँ तो उसे खत्म करके दूसी चीज़ में व्यस्त होने पर मजबूर हो जाती हूँ, तो आपकी क्या सलाह है ॽ तथा मैं नमाज़ के अंदर सिर और दोनों हथेलियों को ढकने की अनिवार्यता को जानना चाहती हूँ, क्या यह अनिवार्य है ॽ तथा मेरी व्यक्तिगत स्थिति के बारे में क्या हुक्म है जबकि मैं ने आपके सामने अपनी स्थिति को स्पष्ट कर दिया है ॽ यदि मैं सिर और दोनों हथेलियों को ढके बिना नमाज़ पढ़ूँ तो क्या मेरी नमाज़ क़बूल होगी ॽ तथा यहाँ पर मैं आपको अपने बारे में इस तथ्य को बताना चाहती हूँ कि मैं बहुत सी कठिनाइयों और परेशानियों का सामना करती हूँ इसलिए नमाज़ के अंदर मैं बहुत आराम और सांस लेने का साधन पाती हूँ। ज्यों ही मैं नमाज़ पढ़ती हूँ और अल्लाह से दुआ करती हूँ तो मेरा सीना खुल जाता है और मेरे अंदर नये सिरे से आशा लौट आती है, किंतु मैं अरबी भाषा नहीं जानती हूँ, तो क्या मुझे अंग्रेज़ी भाषा में क़ुर्आन पढ़ने पर पुन्य मिलेगा ॽ इसी तरह मेरी अधिकांश नमाज़ भी अग्रेज़ी ही में होती है तो क्या वह क़बूल होगी ॽ मैं अभी अरबी भाषा सीखने की प्रक्रिया में हूँ और निकट भविष्य में इन - शा अल्लाह मेरी पूरी नमाज़ अरबी भाषा में होगी। मैं आप से नसीहत, सुझाव और सलाह के लिए अनुरोध करती हूँ, क्योंकि मेरे पास एक या दो के अलावा मुसलमान दोस्त नहीं हैं और वे भी धार्मिकता और धर्मनिष्ठा वाले नहीं हैं, तथा मैं जिस जगह रहती हूँ उसके कारीब कोई ऐसी जगह नहीं है जहाँ जाकर मैं अपने धर्म की शिक्षा प्राप्त कर सकूँ, मेरे लिए इंटरनेट ही एकमात्र साधन है, तथा मुझे यहाँ पर आपको इस सेवा पर धन्यवाद करना नहीं भूलना चाहिए जो आप प्रस्तुत कर रहे हैं, मैं ने इससे बहुत लाभ उठाया है।




