इस लेख मे इस्लामी जन्त्री के अन्तिम महीने ज़ुल-हिज्जा के प्राथमिक दस दिनों की फज़ीलत तथा उन नेक कामों का उल्लेख किया गया है जिन्हें इन दिनों में करना उचित है।
1 - ज़ुल-हिज्जा के प्राथमिक दस दिनों की फज़ीलत।
2 – अरफा के दिन की फज़ीलत।
3- इन दस दिनों में करने योग्य कार्य।
4- हज्ज एंव उम्रा करना।
5- अधिक से अधिक अल्लाह का ज़िक्र करना।
6- क़ुर्बानी करना।
7- रोज़ा रखना।
8- फराईज़ एंव वाजिबात की पाबन्दी करना।
इस लेख मे इस्लामी जन्त्री के अन्तिम महीने ज़ुल-हिज्जा के प्राथमिक दस दिनों की फज़ीलत तथा उन नेक कामों का उल्लेख किया गया है जिन्हें इन दिनों में करना उचित है। साथ ही साथ इन दस दिनों में घटित होने वाली एक महत्वपूर्ण इबादत क़ुर्बानी और एक महान पर्व ईदुल अज़हा के अहकाम का उल्लेख किया गया है।
इत्तिबा-ए-सुन्नत और तक़लीद से संबंधित यह एक बात-चीत है जो एक शांतिपूर्ण वातावरण में अब्दुल्लाह और अहमद नामी दो व्यक्तियों के बीच हुई है। जिस में यह स्पष्ट किया गया है कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत का इत्तिबा करना ही असल दीन है, तथा तक़लीद का खण्डन किया गया है और उस से उपेक्षा करने पर बल दिया गया है।
यह किताब एक हक़ के तलाश करने वाले की दासतान है जिस ने सत्य के खोज में एक लंबा समय बिताने के बाद एक दिन सत्य को स्वीकार करने पर मजबूर हो गया, उसकी यह दासतान हिन्दी पाठकों की सेवा में प्रस्तुत की जा रही है ताकि सत्य के खोजियों के लिये इसे पढ़ कर राह आसान हो जाये।
यह वीडियों हज्ज और उम्रा के लिए आने वाले अल्लाह के अतिथियों के लिये पर्याप्त मागदर्शन पर आधारित है। जिस में हज्ज के प्रकार, हज्ज या उम्रा का एहराम बांधने से पहले क्या करना चाहिए, एहराम बांधने का तरीक़ा, एहराम की हालत में निषिद्ध और वर्जित चीज़ें, उम्रा का तरीक़ा और उस की गततियों पर चेतावनी, हज्ज के कार्यों का विस्तृत वर्णन और उसके दौरान हाजियों से होने वाली गलतियों पर चेतावनी, तथा मिस्जदे नबवी की ज़ियारत के शरई तरीक़े का उल्लेख किया गया है।
जो व्यक्ति नमाज़-रोज़ा नहीं करता है और इसी अवस्था में हज्ज करता है, तो उसके हज्ज का क्या हुक्म है? यदि वह अल्लाह से तौबा कर ले तो क्या वह छूटी हुई इबादतों की क़ज़ा करेगा?
यदि स्त्री बिना महरम के हज्ज करती है तो क्या उसका हज्ज उचित है? क्या समझदार बच्चा महरम बन सकता है? महरम की क्या शर्तें हैं?
क्या क़र्ज़दार आदमी पर हज्ज करना अनिवार्य है?
हज्ज में प्रतिनिधित्वः या किसी अन्य की ओर से हज्ज करना, उन मसाइल में से है जिस के बारे में बाहुल्य रूप से प्रश्न किया जाता है। यह एक शरई हुक्म है जिसके कुछ शुरूत हैं जिनकी पूर्ति करना, और कुछ नियम हैं जिनका पालन करना और कुछ आदाब –शिष्टाचार- हैं जिन से सुसज्जित होना आवश्यक है। इस लेख में उक्त तत्वों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।
हज्ज और उम्रा की फज़ीलतः हज्ज इस्लाम का एक महान स्तम्भ है जिसकी प्रतिष्ठा महान, जिसका अज्र व सवाब बहुत अधिक और मक़्बूल हज्ज का बदला तो केवल जन्नत ही है। इस लेख में सहीह हदीसों में वर्णित उन फज़ाइल और अज्र व सवाब का उल्लेख किया गया जो एक हज्ज और उम्रा करने वाले को प्राप्त होते हैं, इस शर्त के साथ कि उसके अन्दर उसकी स्वीकृति की शर्तें पूरी हों अर्थात् अल्लाह के लिए इख़्लास और पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण।